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“भारत माता को बेच दिया!” — राहुल गांधी का मोदी सरकार पर सबसे बड़ा वार, US ट्रेड डील पर संसद में मचा तूफान

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नई दिल्ली, 12 फरवरी 2026। लोकसभा के बजट सत्र में बुधवार को उस समय राजनीतिक भूचाल आ गया, जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते (India-US Trade Deal) को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अब तक का सबसे तीखा और सीधा हमला बोला। उन्होंने इस ट्रेड डील को “होलसेल सरेंडर” करार दिया (Navbharat Live) और कहा कि “सरकार को शर्म आनी चाहिए कि उसने भारत माता को बेच दिया है।”

संसद में राहुल का विस्फोटक भाषण

बजट चर्चा में हिस्सा लेते हुए राहुल गांधी ने एक के बाद एक ऐसे आरोप लगाए जिसने पूरे सदन में हलचल मचा दी। राहुल गांधी ने कहा कि किसानों के हितों के साथ समझौता किया गया और देश को बेच दिया गया।

उन्होंने टैरिफ के आंकड़ों के जरिए सरकार को घेरा। राहुल के मुताबिक, भारत पर पहले सिर्फ 3 फीसदी अमेरिकी टैरिफ लगता था, लेकिन इस नई डील के बाद यह बढ़कर 18 फीसदी पहुंच चुका है — यानी सीधे तौर पर लगभग 6 गुना की भारी बढ़ोतरी।  दूसरी तरफ, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर टैरिफ 3% से बढ़ाकर 18% कर दिया, तो भारत सरकार ने अमेरिका के लिए अपना टैरिफ 16% से घटाकर शून्य कर दिया।  राहुल गांधी ने इसे देश की “मोलभाव की शक्ति” की घोर विफलता बताया।

किसानों और मजदूरों पर क्या होगा असर?

राहुल गांधी का सबसे तीखा हमला किसानों और मजदूर वर्ग को लेकर था। उन्होंने आरोप लगाया, “हमारे किसान तूफान का सामना कर रहे हैं। आपने हमारे किसानों को कुचले जाने का रास्ता खोला है।”

राहुल गांधी ने आज चार श्रम संहिताओं का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि मजदूरों और किसानों के भविष्य को नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने सवाल किया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मजदूरों और किसानों की सुनेंगे या उन पर किसी “ग्रिप” की पकड़ बहुत मजबूत है?

उन्होंने मनरेगा पर भी चेतावनी दी। नेता प्रतिपक्ष ने कहा, “मनरेगा को कमजोर या खत्म करने से गांवों का आखिरी सहारा भी छिन सकता है। जब उनके (मजदूरों और किसानों के) भविष्य से जुड़े फैसले लिए गए, तब उनकी आवाज को नजरअंदाज कर दिया गया।”

“अगर INDIA गठबंधन होता तो…”

राहुल गांधी ने यह भी बताया कि अगर विपक्ष की सरकार होती तो वे इस डील को कैसे करते। उन्होंने कहा कि इस डील में सबसे महत्वपूर्ण तत्व भारतीय डेटा होता।  उनके अनुसार इस ट्रेड डील की तीन बुनियादी शर्तें होनी चाहिए थीं — पहली, अमेरिका बराबरी के स्तर पर बात करे; दूसरी, भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो; और तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी किसानों की रक्षा। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इस डील ने विदेशी खिलाड़ियों के लिए भारत के गरीब किसानों को कुचलने के दरवाजे खोल दिए हैं।

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि भारत ने अपना डेटा अमेरिकी फर्मों को सौंप दिया है, जिससे किसानों की समस्या और भी बढ़ेगी।

भारत बंद: सड़कों पर उतरे लाखों किसान-मजदूर

राहुल गांधी की आलोचना सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रही। आज 12 फरवरी को पूरे देश में किसान और मजदूर संगठनों ने “भारत बंद” का आयोजन किया। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और देश की कई केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने भारत-US अंतरिम ट्रेड डील, केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों और नए श्रम कानूनों के विरोध में 12 फरवरी को भारत बंद का आह्वान किया।

SKM ने प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुए हालिया व्यापार समझौते को ‘आर्थिक उपनिवेशवाद’ का ब्लूप्रिंट करार दिया है। उनका आरोप है कि इस समझौते के दबाव में केंद्र सरकार ने धान पर दिए जाने वाले बोनस को वापस लेने और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को कमजोर करने का मन बनाया है। (AajTak)

राहुल गांधी ने X पर पोस्ट कर लिखा, “आज देश भर में लाखों मजदूर और किसान अपने हक की आवाज बुलंद करने के लिए सड़कों पर हैं। मजदूरों को डर है कि चार श्रम संहिताएं उनके अधिकारों को कमजोर कर देंगी। किसानों को आशंका है कि व्यापार समझौता उनकी आजीविका पर चोट करेगा।”

सरकार का पलटवार: “डेयरी और कृषि पूरी तरह सुरक्षित”

राहुल गांधी के इन तीखे आरोपों का जवाब देने के लिए स्वयं वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल मैदान में उतरे। उन्होंने राहुल गांधी के दावों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सरकार की व्यापारिक नीतियों के केंद्र में हमेशा किसान ही रहते हैं। गोयल ने कहा, “वाणिज्य मंत्री के रूप में मैं यह जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूं कि अमेरिका या किसी भी देश के साथ किए गए सभी निर्णय हमारे किसानों के कल्याण को ध्यान में रखकर लिए गए हैं।” साथ ही उन्होंने राहुल गांधी को “नकारात्मक मानसिकता” वाला नेता करार दिया।

BJP की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया आई। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी को “कांग्रेस का सबसे समझदार मूर्ख” करार दिया और कहा कि विपक्ष के नेता ने संसदीय शिष्टाचार और भाषाई मर्यादा को सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया है।

राजनीतिक समीकरण और आगे का रास्ता

यह विवाद महज एक ट्रेड डील तक सीमित नहीं है। राहुल गांधी का यह भाषण न केवल ट्रेड डील पर एक सवालिया निशान है, बल्कि 2026 के राजनीतिक समीकरणों में डेटा प्रोटेक्शन और आर्थिक राष्ट्रवाद को एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश भी है।

किसान संगठनों की मांगें साफ हैं — MSP की कानूनी गारंटी, श्रम संहिताओं को वापस लेना, पुरानी पेंशन बहाली और भारत-US ट्रेड डील की समीक्षा। अब देखना यह होगा कि मोदी सरकार इन मांगों पर कितना ध्यान देती है और क्या संसद में यह बहस किसी ठोस नीतिगत बदलाव का रास्ता खोलती है।

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