नई दिल्ली, देश की राजधानी दिल्ली और हरियाणा की पारिस्थितिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण अरवली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार द्वारा अरवली की परिभाषा में किए गए बदलावों पर स्वत: संज्ान लेते हुए इस मामले की सुनवाई सोमवार को करने का निर्णय लिया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
अरवली पर्वत श्रृंखला, जो लगभग 70 करोड़ वर्ष पुरानी मानी जाती है, दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए एक प्राकृतिक फेफड़े का काम करती है। यह पर्वत श्रृंखला न केवल वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में सहायक है, बल्कि भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हाल ही में हरियाणा सरकार ने अरवली क्षेत्र की भौगोलिक परिभाषा में संशोधन करते हुए कुछ क्षेत्रों को अरवली के दायरे से बाहर करने का प्रयास किया। पर्यावरणविदों और नागरिक समाज संगठनों का आरोप है कि इस पुनर्परिभाषा का उद्देश्य रियल एस्टेट और खनन गतिविधियों के लिए अरवली की संरक्षित भूमि को खोलना है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वत: संज्ञान लिया है। न्यायालय ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर तत्काल सुनवाई की आवश्यकता महसूस की है। शीर्ष अदालत ने हरियाणा सरकार, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए सोमवार को विस्तृत सुनवाई का आदेश दिया है।
कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह है कि क्या राज्य सरकार को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों की परिभाषा में एकतरफा बदलाव करने का अधिकार है, खासकर जब यह बदलाव पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होता है।
पर्यावरणविदों की चिंताएं
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि अरवली की पुनर्परिभाषा से हजारों एकड़ वन भूमि और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र असुरक्षित हो जाएंगे। उनका तर्क है कि दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरणीय गिरावट के दौर में अरवली का संरक्षण और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
प्रमुख पर्यावरणविद् और कार्यकर्ता इस बदलाव को दिल्ली की पारिस्थितिकी के लिए घातक बता रहे हैं। उनका मानना है कि अरवली की रक्षा केवल हरियाणा का नहीं, बल्कि पूरे एनसीआर क्षेत्र के करोड़ों निवासियों के स्वास्थ्य और भविष्य का प्रश्न है।
सरकार का पक्ष
हरियाणा सरकार का तर्क है कि पुनर्परिभाषा वैज्ञानिक अध्ययनों और भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों पर आधारित है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, कुछ क्षेत्र जो भौगोलिक रूप से अरवली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा नहीं हैं, उन्हें गलती से शामिल कर लिया गया था, जिसे अब सुधारा जा रहा है।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यदि यह केवल तकनीकी सुधार है, तो इसे पारदर्शी तरीके से विशेषज्ञों की समिति और जनसुनवाई के माध्यम से किया जाना चाहिए था।
पिछले निर्णय और कानूनी स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी अरवली के संरक्षण पर कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। वर्ष 2002 में शीर्ष अदालत ने अरवली क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर रोक लगाई थी। इसके बाद भी अदालत को कई बार अरवली के अतिक्रमण और अवैध निर्माण के मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ा है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी समय-समय पर अरवली के संरक्षण को लेकर सख्त निर्देश जारी किए हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और वन संरक्षण अधिनियम के तहत अरवली क्षेत्र को विशेष सुरक्षा प्राप्त है।
पर्यावरणीय महत्व
अरवली पर्वत श्रृंखला दिल्ली को राजस्थान के रेगिस्तान से आने वाली गर्म हवाओं और धूल भरी आंधियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह क्षेत्र विभिन्न दुर्लभ वनस्पतियों और जीव-जंतुओं का निवास स्थान भी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अरवली की पहाड़ियां दिल्ली-एनसीआर के तापमान को नियंत्रित करने, वर्षा के पैटर्न को प्रभावित करने और भूजल स्तर को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। इसके क्षरण से पूरे क्षेत्र की जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
आगामी सुनवाई
सोमवार को होने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह हरियाणा सरकार से पुनर्परिभाषा के वैज्ञानिक आधार, प्रक्रिया में पारदर्शिता और पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन से जुड़े सवाल पूछेगा। न्यायालय किसी भी निर्माण या विकास गतिविधि पर अंतरिम रोक भी लगा सकता है।
पर्यावरण समूह और नागरिक समाज संगठन इस सुनवाई में हस्तक्षेप करने की तैयारी कर रहे हैं। उनका उद्देश्य न्यायालय के समक्ष वैज्ञानिक तथ्य और पर्यावरणीय आंकड़े प्रस्तुत करना है जो अरवली के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
यह मामला न केवल अरवली के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि देश में पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास की बहस में भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।


